भक्ति के साथ विश्वास भी जरूरी है… कम ही लोग जानते हैं किस तरह काम करती है भक्ति की शक्ति

भक्ति के साथ विश्वास भी जरूरी है ।
कृष्ण भोजन के लिए बैठे थे।एक दो कौर मुँह में लेते ही अचानक उठ खडे हुए। बड़ी व्यग्रता से द्वार की तरफ भागे ,फिर लौट आए उदास और भोजन करने लगे।
रुक्मणी ने पूछा ,”प्रभु,थाली छोड़कर इतनी तेजी से क्यों गये ? और इतनी उदासी लेकर क्यों लौट आये ?”
कृष्ण ने कहा ,”मेरा एक प्यारा राजधानी से गुजर रहा है , नंगा फ़कीर है । इकतारे पर मेरे नाम की धुन बजाते हुए मस्ती में झूमते चला जा रहा है। लोग उसे पागल समझकर उसकी खिल्ली उड़ा रहे हैं ।
उस पर पत्थर फेंक रहे हैं ,और वो है कि मेरा ही गुणगान किए जा रहा है ।
उसके माथे से भी खून टपक रहा है, वह असहाय है ,इस लिए दौड़ना पड़ गया “ तो फिर लौट क्यों आये ?”
कृष्ण बोले , ”मैं द्वार तक पहुँचा ही था कि उसने इकतारा नीचे फेंक दिया और पत्थर हाथ में उठा लिया।
अब जब वह खुद ही उत्तर देने में तत्पर हो गया है ।
उसे अब मेरी जरूरत ही न रही ।
जरा सा रूक जाता, मेरे ऊपर पूर्ण विश्वास रखता तो मैं पहुँच गया होता |
यही पर आकर हम अपने भगवान् पर विश्वास खो देते है । भगवान् जरा सी परीक्षा लेते है और हम धैर्य नहीं रख पाते।
इस लिए अपनी भक्ति को दृढ बनाना चाहिए।

भक्तराज अम्बरीष सप्तद्वीपवती पृथ्वी के एकमात्र सम्राट् थे। भक्तराज अम्बरीष की संसार के भोग पदार्थों में उनकी जरा भी आसक्ति न थी उनका स्मपूर्ण जीवन भगवान की सेवा में समर्पित था। तो जानिए किस प्रकार कि भगवान विष्णु ने अपने भक्त अम्बरीष की रक्षा, आइये जानते हैं भक्ति में शक्ति की कथा भक्तराज अम्बरीष महाराज नाभाग के पु्त्र थे। वे सप्तद्वीपवती पृथ्वी के एकमात्र सम्राट् थे। सम्पुर्ण ऐश्वर्य के अधीश्वर होते हुए भी संसार के भोग पदार्थों में उनकी जरा भी आसक्ति न थी उनका स्मपूर्ण जीवन भगवान की सेवा में समर्पित था। जो अनन्यभाव से भगवान् की शरणागति प्राप्त कर लेता हैं, उनका योग क्षेम का सम्पूर्ण भार भगवान् अपने उपर ले लेते हैं। इसीलिये महाराज अम्बरीष की सुरक्षा के लिये भगवान ने अपने सुदर्शन चक्र को नियुक्त किया था। सुदर्शन चक्र गुप्त रूप से भगवान की आज्ञानुसार महाराज अम्बरीष के राजद्वार पर पहरा दिया करते थे

एक समय सहाराज अम्बरीष ने अपनी रानी के साथ भगवान श्रीकृष्ण की प्रीति के लिये वर्ष भर की एकादशीव्रत का अनुष्ठान किया अन्तिम एकादशीव्रत का अनुष्ठान किया आन्तिम एकादशी के दूसरे भगवान की सविधि पूजा की गई ब्राम्हाणों को भोजन कराया गया। और इन्हें वस्त्राभूषणों से अलंकृत गौएँ दान में दी गयीं तदनन्तर राजा अम्बरीष पारणकी तैयारी कर ही रहे थे कि अचानक महार्षि दुर्वासाजी ने उनके निवेदन को स्वीकार किया। और मध्याह्र संध्या के लिए यमुना तट पर चाले गये द्वादशी केवल एक घड़ी मात्र शेष थी।

द्वादशी में पारण न होने पर महाराज को व्रतभंड्ग का दोष लगता, अत: उन्होंने ब्राम्हाणों की आज्ञा से भगवान का चरणोदक पान कर लिया और भोजन के लिये दुर्वासा की प्रतीक्षा करने लगे। दुर्वासा जी जब अपने नित्यकर्म से निवृत होकर राजमहल लौटे, तब उन्हें तपोबल से राजा के द्वारा भगवान के चरणामृत से पारण की बात अपने आप मालूम हो गयी।

उन्होंने क्रोधित होकर महाराज अम्बरीष से कहा- मूर्ख तू भक्त नही ढोंगी है। तूने मुझ अथिति को निमन्त्रण देकर भोजन कराने से पहले ही भोजन की लिया इसलिए में कृत्या के द्वारा अभी तुझे नष्ट कर देता हुँ। ऐसा कहकर उन्होंने अपने मस्तक से जटा उखाड़कर पृथ्वी का पर पटका, जिससे कालाग्रि के समान एक कृत्या उत्पन्न हुई। वह भयानक कृत्या तलवार लेकर अम्बरीष को मारने दौड़ी उसके अम्बरीष तक पहुँचने के पूर्व ही भगवान के सुदर्शन चक्र ने उसे जलाकर भस्म कर दिया। कृत्या को समाप्त करके सुदर्शन चक्र ने मारने के लिये दुर्वासा का पीछा किया। दुर्वासा अपनी रक्षा के लिये तीनों लोकों और चौदहों भुवनों में भटके किंतु भगवान और भक्त के द्रोही को किसीने भी आश्रय नहीं प्रदान किया अंत में दुर्वासा भगवान विष्णु के पास गये भगवान ने उनसे कहा- मैं तो भक्ति के आधीन हुँ। मैं भी आपकी रक्षा करने में असमर्थ हुँ। आपकी रक्षा का अधिकार केवल अम्बरीष को ही हैं अत: आपको उनकी शरण में जाना चाहिये अन्तत: दुर्वासा व्याकुल होकर अम्बरीष की शरण में गये और पहुँचते ही उनके चरण पकड़ लिये अम्बरीष उनकी प्रतीक्षा में तभी से खड़े थे, जब से चक्र ने उनका पीछा किया था उन्होंने सुदर्षन चक्र की स्तुति की और दुर्वासा को क्षमादान दिलाया। यह हैं भगवान की भक्ति की शक्ति और भक्त की करूणा। दुर्वासा भगवान के भक्ति की शक्ति को प्रणाम किरके अम्बरीष का गुणगान करते हुए तपस्या हेतु वन को चले गये।

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